पिता-पुत्र और उसकी पत्नी हिंदी कहानी

यह कहानी बाताती है की समय के साथ व्यक्ति की सोच कैसे परिवर्तित हो जाती है एक पिता जब अपने बच्चों का पालन पोषण करता है लेकिन बुढ़ापे के अंतिम चरणों में उसके बच्चें उसके बुढ़ापे का सहारा बनने के स्थान पर उसे दुद्कार देते है ऐसी ही कहानी आज आप पढ़ रहे है. यह कहानी भी पढ़े -> कोरा ज्ञान हिंदी कहानी

एक गाँव में एक छोटा सा परिवार रहता था उसमे दो पति-पत्नी और उनके दो बच्चे, एक लड़का और एक लड़की थी. समय बीतता जाता है, सभी ख़ुशी-ख़ुशी अपना जीवन व्यतित करते हैं.

दोनों बच्चें बड़े हो जाते है दोनों में लड़की बड़ी होती है इसलिये उसकी शादी पहले हो जाती हैं और वह ससुराल चली जाती है कुछ समय बाद उसकी माँ की तबियत ख़राब हो जाती है जिसके कारण उसकी मृत्यु हो जाती है.

अब उस घर में केवल दो ही लोग थे एक लड़का और उसके पिता, माँ और बेटी के चले जाने के बाद उनके घर में सुना-सुना सा लगने लगा था यह देख उसके पिता ने लड़के की शादी कर दी.

घर में नई बहू का आगमन हो गया था खुशहाली फिर से लौट आयी थी कुछ दिनों तक बहुत ही अच्छा चलता रहा था. लेकिन बहू नए खयालात की थी उसे सास-ससुर की सेवा और आशीर्वाद आदि में कोई इंट्रेस्ट (मतलब) नहीं था.

समय बीतता जाता है अब लड़के के पिता जी भी बूढ़े हो रहे थे उनका बहू बेटे के सिवा ख्याल रखने वाला दूसरा कोई नहीं था.

अपने ससुर की सेवा करना और उन्हें समय पर खाना-पानी देना, यह बहु का काम था लेकिन वह यह सब काम करने में गुस्सा करती थी.

एक दिन उसने अपने पति से कहाँ की तुम अपने पिता से अलग हो जाओ अब मैं और अधिक उनकी सेवा नहीं कर सकती मुझ से उनकी सेवा नहीं होती है यह कहकर वह चुप हो जाती है.

लड़का बोलता है, तुम्हारा दिमाग तो ख़राब नहीं हो गया है? तुम क्या बोले जा रही हो? वो मेरे पिता है बचपन से पाला है मुझे। मैं उनसे दूर कैसे रह सकता हूँ. गुस्से से इतना कहते हुये वह घर से बाहर निकल जाता है.

कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहता है करीब दो साल बीत जाते हैं एक दिन बहु फिर से अपने पति से कहती है, की आज तो तुमको हम दोनों में से किसी एक को ही चुनना होगा।

मैं अब और तुम्हारे पिता को नहीं सह सकती. तुम अभी बता दो की तुम्हे किसके साथ रहना है? पिता के साथ या मेरे साथ?

यह सुन कर लड़के का दिमाग हिल गया उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था उसने कुछ नहीं बोला और घर से बाहर निकल जाता है. उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था.

जब रात हुई तो उसे नींद भी नहीं आ रही थी वह बस सोचे ही जा रहा था की क्या करूँ पिता को साथ रखूँगा तो पत्नी चली जायेगी।

उसने अपने पिता से कहा- पिता जी चलो थोड़ा घूम के आते है पिता ने कहा बेटा आधी रात को कहाँ घूमने जायेंगे?

उसने कहा आप चलो तो सही. वे दोनों बातें करते-करते जंगल में चले गए. बीच जंगल में जाने के बाद उसने अपने पिता से कहा पिता जी मुझे माफ़ करना लेकिन आपका और मेरा साथ यहीं तक का था अब में आपको अपने साथ नहीं रख सकता।

अगर आपको साथ रखूँगा तो मेरी पत्नी मेरे साथ नहीं रहेगी। आपका तो जीवनकाल भी पूरा होने वाला है आपका तो अंतिम समय चल रहा है अब हम जीवन में फ़िर कभी नहीं मिलेंगे। लेकिन वो तो मेरे साथ 7 (सात) जन्मों तक रहने वाली है।

पिता ने आँखों में आसूँ लिये काँपते होठों से कहा, कोई बात नहीं बेटा तू चला जा, लेकिन मुझे यहाँ से 3 किलोमीटर और आगे छोड़ दे।

बेटे ने कहा, 3 किलोमीटर आगे क्यों पिता जी? बाप ने कहा- क्यूंकि लगभग 20 साल पहले मैंने भी अपने बाप को यहाँ से 3 किलोमीटर आगे ही छोड़ा था.

तू यहाँ से जाने से पहले निशान बना के जाना क्यूंकि आज से 20 साल बाद तुझे भी यहीं आना है.

कहानी का सार इस कहानी से यह सिख मिलती है की बेटे को अपने माता-पिता का बुढ़ापे में सहारा बनना चाहिये न की पत्नी और बच्चों के मोह में आकर उन्हें अलग करना चाहिये। ये वही माता पिता है जिनके कारण तुम्हारी पत्नी आई है, इन्होंने ने ही तुम्हारी शादी की है.

जैसा तुम अपने माता- पिता और सास-ससुर के साथ बुढ़ापे में व्यव्हार करते हो, वैसा ही तुम्हारे बुढ़ापे में तुम्हारे बेटे और बहु तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार करेंगे।

इसलिये हमेशा अपने माता-पिता के साथ रहिये और जितनी हो सके उनकी सेवा कीजिये।

क्यूंकि जिस प्रकार दीपक को उसकी तली में छिपा अँधेरा दिखाई नहीं देता है उसी प्रकार एक जवान व्यक्ति को उसकी जवानी के पीछे छुपा बुढ़ापा और कमज़ोरी दिखाई नहीं देती है.

कहानी पढ़ने के लिए धन्यवाद

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